घर रेंट पर दिया है तो किरायेदारी अधिनियम के बारे में यह 10 बातें भी जान लें, फायदे में रहेंगे
अकसर लोगों को शिक्षा या रोजगार के मकसद से अपने टीयर-2 और टीयर-3 शहरों के खूबसूरत और बड़े घरों से निकलकर मेट्रो शहरों में किराये पर आकर रहना पड़ता है। इतना ही नहीं, उनकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा घर किराये पर लेने में खर्च होता है, क्योंकि मेट्रो शहरों के मकान मालिकों की किराये की मांग काफी ज्यादा होती है। सुरक्षा कारणों के मद्देनजर मकान मालिक भी अनजान लोगों को घर किराये पर देने में हिचकते हैं। साथ ही वह इस बात का भी फैसला नहीं कर पाते कि वह जो प्रॉपर्टी किराये पर दे रहे हैं, उसका उन्हें सही दाम मिल रहा है या नहीं।
शहरीकरण और भारत में किराए के मकान की बढ़ती रफ्तार के बीच यह जरूरी था कि सरकार रेंटल हाउजिंग इकनॉमी को विनियमित करने की नीति पर दोबारा गौर करे। किराये पर नियंत्रण रखने वाले नियम भारत में आजादी से पहले साल 1914 और 1945 में लागू हुए थे, जो वक्त से साथ काफी पुराने हो चुके हैं। इसलिए 2 साल पहले केंद्र सरकार ने किरायेदारी अधिनियम, 2015 का एक ड्राफ्ट मॉडल पेश किया था। प्रॉपटाइगर इसी ड्राफ्ट की कुछ अहम बातें आपको बता रहा है, जिससे देश में घर किराये पर देने के तरीकों में बदलाव दिख सकता है।
सिक्योरिटी डिपॉजिट की वापसी: इस ड्राफ्ट के मुताबिक किराए का तीन गुना सिक्योरिटी डिपॉजिट लेना तब तक गैर-कानूनी होगा, जब तक इसका अग्रीमेंट न बनवाया गया हो। किरायेदार के घर खाली करने पर मकानमालिक को एक महीने के भीतर यह रकम लौटानी होगी।
रेनोवेशन के बाद किराया बढ़ाना: ड्राफ्ट में कहा गया है कि बिल्डिंग के ढांचे की देखभाल के लिए किरायेदार और मकानमालिक दोनों ही जिम्मेदार होंगे। अगर मकानमालिक ढांचे में कुछ सुधार कराता है तो उसे रेनोवेशन का काम खत्म होने के एक महीने बाद किराया बढ़ाने की इजाजत होगी। हालांकि इसके लिए किरायेदार की सलाह भी ली जाएगी। दूसरी ओर, रेंट अग्रीमेंट लागू होने के बाद अगर बिल्डिंग का ढांचा खराब हो रहा है और मकानमालिक रेनोवेट कराने की स्थिति में नहीं है तो किरायेदार किराया कम करने को कह सकता है। किसी भी झगड़े की स्थिति में किरायेदार रेंट अथॉरिटी से संपर्क कर सकता है।
बिना बताए नहीं आ सकता मकानमालिक: परिसर के मुआयने, रिपेयर से जुड़े काम या किसी दूसरे मकसद से आने के लिए भी मकानमालिक को 24 घंटों का लिखित नोटिस एडवांस में देना होगा।
किराया न देने पर निकालना: रेंट अग्रीमेंट में लिखी अवधि से पहले किरायेदार को तब तक नहीं निकाला जा सकता, जब तक उसने लगातार कई महीनों तक किराया न दिया हो या वह प्रॉपर्टी का दुरुपयोग कर रहा हो। अगर रेंट अग्रीमेंट खत्म होने के बाद भी वह मकान खाली नहीं कर रहा है तो मकानमालिक को दुगना मासिक किराया मांगने का अधिकार है।
नोटिस पीरियड: किरायेदार के लिए यह जरूरी है कि वह घर छोड़ने से पहले मकान मालिक को एक महीने का नोटिस दे।
इसका भी रखें ध्यान: बतौर किरायेदार आप किराये के मकान को बिना अपने मकानमालिक की इजाजत के किराये पर किसी और को नहीं दे सकते।
किरायेदार की मौत होने पर: रेंट अग्रीमेंट के दौरान अगर किरायेदार की मौत हो जाए तो? इसके लिए ड्राफ्ट में कहा गया है कि अग्रीमेंट उसकी मौत के साथ ही खत्म हो जाएगा। लेकिन अगर उसके साथ परिवार भी है तो किरायेदार के अधिकार उसकी पत्नी या बच्चों के पास चले जाएंगे।
सिविल कोर्ट नहीं करेगा सुनवाई: ड्राफ्ट में केंद्र, राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों से कहा गया है कि वह किराया विवाद निपटाने वाली अदालतों, प्राधिकरण या अधिकरण का गठन करें। यह संस्थाएं सिर्फ मकानमालिक और किरायेदारों के विवादों का निपटारा करेंगी। इसका मतलब है कि आप किराये से संबंधित विवाद निपटाने के लिए सिविल अदालतों का रुख नहीं कर सकते।
तार्किक सलाहों के लिए खुला: इस ड्राफ्ट का मकसद किराये के नियमन के लिए ढांचा, मकानमालिकों एवं किरायेदारों के अधिकारों और जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाना है। ड्राफ्ट में कहा गया है कि यह न तो केंद्रीय कानून है और न ही संसद द्वारा लागू किए जाने वाला केंद्रीय विधेयक। इसका मतलब है कि ड्राफ्ट सिर्फ एक प्रस्ताव है, जो बाध्यकारी नहीं है। इसके अलावा यह तार्किक सलाहों के लिए खुला है।
ये नहीं हैं शामिल: ड्राफ्ट के प्रावधान सरकारी, शैक्षिक, कंपनियों, धार्मिक और चैरिटेबल संस्थाओं की इमारतों पर लागू नहीं होंगे।